देहरादून। उत्तराखंड के साहसी युवाओं ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उनके हौसले हिमालय की चोटियों से भी ऊंचे हैं। प्रदेश के विभिन्न जिलों से चुने गए 36 जांबाज पर्वतारोही अब हिमालय की तीन प्रमुख चोटियों पर तिरंगा फहराने के भव्य अभियान पर निकल पड़े हैं। देहरादून स्थित 'हिमालयन कल्चर सेंटर' से उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद और भारतीय पर्वतारोहण संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस ऐतिहासिक पर्वतारोहण अभियान को पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया।
उत्तराखंड की हिमालयी पहचान को साहस, हुनर और नए अवसरों से जोड़ने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। प्रदेश के 36 युवा पर्वतारोही तीन ऊंची हिमालयी चोटियों पर तिरंगा फहराने के अभियान पर रवाना हो गए हैं। खास बात यह है कि 6,252 मीटर ऊंची माउंट स्वर्गारोहिणी-I के आरोहण के लिए पूरी तरह महिला पर्वतारोहियों का दल भेजा गया है। यह दल अनुभवी पर्वतारोही लता बिष्ट के नेतृत्व में शिखर अभियान को अंजाम देगा। उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद और भारतीय पर्वतारोहण संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीनों पर्वतारोहण अभियानों को देहरादून स्थित हिमालयन कल्चर सेंटर से पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। इस अवसर पर पर्यटन सचिव एवं उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी धीराज सिंह गर्ब्याल और भारतीय पर्वतारोहण संघ के अध्यक्ष कर्नल विजय सिंह सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे। तीनों अभियानों में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से चयनित 36 युवा पर्वतारोही शामिल हैं। प्रत्येक दल में 12 सदस्य हैं। पहला दल 6,512 मीटर ऊंचे माउंट भागीरथी-II के लिए रवाना हुआ है। इसकी कमान दशरथ सिंह रावत संभाल रहे हैं। दूसरा दल 6,355 मीटर ऊंचे माउंट पंचाचूली-I का आरोहण करेगा और इसका नेतृत्व विजय सिंह रौतेला कर रहे हैं। तीसरा दल 6,252 मीटर ऊंची माउंट स्वर्गारोहिणी-I की चुनौती स्वीकार करेगा। इस दल की कमान अनुभवी पर्वतारोही लता बिष्ट के हाथों में है। तीनों अभियानों में स्वर्गारोहिणी-I का दल विशेष आकर्षण का केंद्र है। इसमें केवल महिला पर्वतारोही शामिल हैं। नैनीताल, पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, देहरादून, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और टिहरी जिलों की 12 महिला पर्वतारोही इस अभियान का हिस्सा हैं। हिमालय की कठिन परिस्थितियों में शिखर तक पहुंचने का यह अभियान उत्तराखंड में साहसिक खेलों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को भी सामने ला रहा है। पर्यटन विभाग की योजना केवल पर्वतारोहण अभियानों तक सीमित नहीं है। सरकार उत्तराखंड को धार्मिक और पारंपरिक पर्यटन के साथ ट्रेकिंग, पर्वतारोहण, माउंटेन बाइकिंग और अन्य साहसिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाने की दिशा में काम कर रही है। इसके पीछे युवाओं के लिए प्रशिक्षण, रोजगार और स्थानीय स्तर पर आजीविका के अवसर विकसित करने का लक्ष्य भी बताया गया है। इसी कड़ी में 18 सितंबर को प्रदेश के 100 ट्रेकिंग रूट की GPS मैपिंग के लिए दल रवाना किए गए थे। इनमें गढ़वाल के 50 और कुमाऊं के 50 ट्रेकिंग रूट शामिल हैं। मैपिंग के जरिए इन मार्गों का डिजिटल डेटा तैयार किया जा रहा है। इसके आधार पर मोबाइल ट्रेकिंग नेविगेशन ऐप और ‘द ट्रेक्स ऑफ उत्तराखंड’ नाम से कॉफी टेबल बुक तैयार करने की योजना है। इससे ट्रेकिंग मार्गों की जानकारी पर्यटकों और पर्वतारोहियों को डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। आने वाले महीनों में भी साहसिक पर्यटन से जुड़े कई बड़े आयोजन प्रस्तावित हैं। 24 से 26 अक्टूबर 2026 तक पिथौरागढ़ में आदि कैलाश परिक्रमा 2.0 आयोजित होगी। 20 से 26 नवंबर तक अल्टीमेट उत्तराखंड एमटीबी चैलेंज का पांचवां संस्करण होगा, जिसका करीब 700 किलोमीटर लंबा रूट मुक्तेश्वर से मसूरी तक रहेगा। वहीं, 19 से 21 नवंबर तक हिमालयन कार रैली आयोजित की जाएगी। इसे 1980 और 1990 के दशक में चर्चित रही अल्टीमेट हिमालयन कार रैली को नए रूप में शुरू करने की दिशा में कदम बताया गया है। पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि पर्वतारोहण केवल किसी शिखर तक पहुंचने का अभियान नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य और नेतृत्व की परीक्षा भी है। उन्होंने महिला पर्वतारोहियों के दल को प्रदेश की बेटियों के साहस का प्रेरक उदाहरण बताया। उनके अनुसार सरकार का प्रयास है कि उत्तराखंड के युवा हिमालय को केवल देखने तक सीमित न रहें, बल्कि प्रशिक्षित पर्वतारोही, गाइड और एडवेंचर प्रोफेशनल के रूप में आगे बढ़ें। पर्यटन सचिव धीराज सिंह गर्ब्याल ने कहा कि GPS मैपिंग के जरिए ट्रेकिंग मार्गों को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने पर काम किया जा रहा है। उन्होंने पर्वतारोहण दलों से ‘Safety First’ और ‘Leave No Trace’ के सिद्धांतों का पालन करने की अपेक्षा जताई। उत्तराखंड के लिए इन अभियानों का महत्व सिर्फ शिखर फतह करने तक सीमित नहीं है। हिमालय की चोटियों से लेकर गांवों के ट्रेकिंग रूट और साहसिक आयोजनों तक पर्यटन का दायरा बढ़ाने की कोशिश है। यदि प्रशिक्षण, सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय रोजगार को साथ लेकर यह मॉडल आगे बढ़ता है तो हिमालयी पर्यटन के साथ प्रदेश के युवाओं के लिए भी नए अवसर तैयार हो सकते हैं।

